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शीर्षक – मैं लिख रहा हूँ….!!

मैं लिख रहा हूँ रोज़ तुझे जानने के लिए,
उन धुंदली तस्वीरों से समय की रेत हटाने के लिए,

लफ्ज़ की बारीकियां काम आ जाती हैं यूँ,
कुछ कहे कुछ अनकहे एहसास बताने के लिए,

लाखों धागों से बना वो दुनिया सा लगता हैं मुझे,
समाज के झूठे ढकोसले समाज के सामने लाने के लिए,

मैं लिख रहा हूँ रोज़ तुझे जानने के लिए,
उन धुंदली तस्वीरों से समय की रेत हटाने के लिए..!!

करता हैं हर बात पे ये शहर मुझसे सवाल,
मुझसे मेरी रूह का एक हिस्सा जलाने के लिए,

चीखते हैं वो पहाड़ यूँ आग में तड़पे हुए,
खुबसूरत भविष्य के सपने सजाने के लिए,

मैं लिख रहा हूँ रोज़ तुझे जानने के लिए,
उन धुंदली तस्वीरों से समय की रेत हटाने के लिए…!!

मुसाफ़िर

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शीर्षक – गाड़ी वाला इंसान…!!

हर कही हमें एक इंसान नजर आ ही जाता है जो दिन रात गाड़ी चलता है मेहनत करता हैं फिर चाहे वो रिक्शावाला हो, ताँगेवाला हो या कोई सब्जियां बेचने वाला ऐसा हर इंसान अपने पूरे घर को पालता पोस्ता हैं, मेरी ये कविता उन्ही इंसानों के लिए हैं… कल Father’s day  भी हैं तो सभी उन पिताओं को भी मेरी ये कविता समर्पित हैं जो अपने बच्चों के लिए दिन रात मेहनत करते है और उन्हें एक अच्छी ज़िंदगी देने की कोशिश करते है..!!!

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शीर्षक – गाड़ी वाला इंसान…!!

दो पहियों की गाड़ी पर वो,

चार लोगों का पेट है पालता,

छोटा से कंधों पे अपनी दुनिया का वो बोझ संभालता,
गर्मी देखे ना छाँव सुहानी,

बारिश से भी वो पेंचे लड़ाता,

दो कदमों से जानें कितनों को उनकी मंजिल तक पहुँचाता,
सुबह से शाम बस चलता जाता,

प्याज़ रोटी से भूख मिटाता,

अपनी उखड़ी साँसों से कितनों का जीवन संवारता,
भला भी सुनता, बुरा भी सुनता,

खुली आँखों से सपनें भी बुनता,

उन्हीं सपनों के लिए वो खून को भी पसीना समझता,
थका हारा जब घर लौटता,

अपनी परेशानी कुछ न बोलता,

फिर भी सूखे होंठो से बच्चों को लोरी गाकर सुनता,
रात भर चाँद देखता,

हर सुबह नया सूरज पाता,

हार न माने चाहे जो हो, तक़दीर के आगे सर ना झुकाता,
दो पहियों की गाड़ी पर वो,

चार लोगों का पेट है पालता,

छोटा से कंधों पे अपनी दुनिया का वो बोझ संभालता…!!
✒©मुसाफ़िर

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#musafir  #hindikavita #tangewala #aamInsaan #HappyFather’sDay

शिक्षा और व्यापार..!!

शिक्षा के व्यापारीकरण के कारण रोज बहुत से हुनरमंद इंसान कही ग़ुम हो जाते हैं। कुछ पैसों के लालच में रोज़ाना कई ज़िंदगियां रोज अपनी हिम्मत तोड़ घुटने टेक देती है इस बाज़ारवादी सोच के सामने। उन्ही मासूम और हुनरमंद लोगो के लिए मेरी तरफ से ये कविता उन सब बाजार के दुकानदारों के नाम..!! दिल तो गलियों से उनकी तारीफ करने का था मगर मेरी भी अपनी मर्यादा हैं इसीलिये ये शब्द लिखकर दिल को तस्सली दे रहा हूँ।

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शीर्षक – शिक्षा और व्यापार..!!📖💭
किताब का ज्ञान भी कम पड़ जाता हैं,

जब व्यापार, शिक्षा को डस जाता हैं,
फिजूल ही लगती हैं ये डिग्रियां सारी,

जब नोटों के बिस्तर पर ईमान नंगा हो जाता हैं,
क्या हो गया अगर कोई बेहतर हैं तो भी,

अंधी चमचागिरी ही जब शहंशाह का दिल लुभाता हैं,
हिम्मत हैं अगर तो सही बात पर तर्क करो,

यूँ काफ़ीरो की तरह तो हर कोई जीत जाता हैं,
रात के अंधेरो में तुम असलियत पर आते हो,

मगर दिन के उजालों ये झूठ तो हर कोई जानता हैं,
पैसा ही सब कुछ हैं अगर तो,भगवान ये ढोंग क्यों,

भगवान से तो डरो, वो तुम्हारी रग रग पहचानता हैं,
बस करो अब बस करो,खेल ये बाजार का,

तुम्हारे इसी खेल में, एक हुनर जान से जाता हैं,
किताब का ज्ञान भी कम पड़ जाता हैं,

जब व्यापार, शिक्षा को डस जाता हैं…!!
✒©मुसाफ़िर

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